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गोधूली बेला में श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ कालिया नाग मर्दन करते हुए – काशी की नाग नथैया

वाराणसी | अद्भुत लीला के मंचन की जो पूरी दुनिया में केवल काशी में होता है ,भगवान श्री राम की लीला को जन-जन तक पहुंचाने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी ने सिर्फ मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र पर ही काम नहीं किया, शिव नगरी काशी में रामलीला के जनक गोस्वामी तुलसीदास ने श्री कृष्ण लीला की शुरुआत की थी| उनके द्वारा शुरू की गई कृष्ण लीला नाग नथैया उस जमाने में भी ऐसा प्रचार प्रसार हुआ था, मुगल बादशाह अकबर लीला को देखने के लिए काशी पहुंचे | 1608 से 1611 के बीच की है, यह वह समय था|

जब महान कवि गोस्वामी तुलसीदास जी अपने ही उपासक भगवान श्री राम की पटकथा लिख रहे थे| वह आज भी था धर्म एवं आस्था की नगरी काशी में तुलसी घाट के रूप में स्थापित है | मान्यता है कि काशी वासियों के भगवान भोलेनाथ के भक्ति बीच श्री राम लीला के साथ-साथ श्री कृष्ण लीला का भी गोस्वामी जी बोध करना चाहते थे |

तुलसी घाट पर श्री कृष्ण के नटखट रूप में कालिया नाग मर्दन की जीवन लीला का मंचन कराया जिसे नाग नथैया के नाम से भी जाना जाता है| इसके बाद से शुरू हुआ श्री कृष्ण लीला जीवन लीला का मंचन आज भी लगातार हो रहा है इसलिए लीला का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है|

वाराणसी एवं प्रांतों के अलावा विदेशों से भी दर्शनार्थी अनोखे पल को निहारने के लिए तुलसी घाट पर पहुंचते हैं, यह मेला दीपावली के बाद काशी के तुलसी घाट पर आयोजित किया जाता है |नाग नथैया के दिन तुलसी घाट पर हजारों लोगों की भीड़ जमा होती है, सायंकाल गोधूली बेला में श्रीकृष्ण अपने सखाओं संत गेंद खेलते हैं,

तभी अचानक गेंद यमुना में चली जाती है और सखा उनसे गेंद लाने का आग्रह करते, सखाओं बार-बार आग्रह करने पर श्री कृष्ण कदम के पेड़ पर चढ़ जाते हैं और गंगा रूपी की यमुना मैं अचानक छलांग लगा देते हैं और कुछ समय बाद कालिया नाग का मर्दन करते हुए उसके फन पर बंसी बजाते हुए बाहर निकलते हैं| श्रद्धालुओं की जय श्री कृष्ण, हर हर महादेव, गगनभेदी नारों से पूरा आकाश गुंजन मान हो जाता है|

माहौल इस कदर हो जाता है, कि यह लगता ही नहीं कि यह काशी का तुलसी घाट लगता है कि यह वृंदावन की यमुना घाट है ऐसा लगता है मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया |

जब आप स्वयं इस लीला के साक्षी बनते हैं, तो ऐसा लगता है कि मानव विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण की लीला अपरंपार है हर रूप में श्री कृष्ण सभी को अपनी माया से अचंभित किया है, बाल रूप में पूतना का संहार किया था | आगे चलकर बांके बिहारी रूप में और कुरुक्षेत्र में विराट रूप में पूरी सृष्टि को दिखाया |मुरलीधरन घर के भी चमत्कारी रूप है, नाग नथैया यानी कालिया नाग के फन पर श्री कृष्ण का बांसुरी रूप नित्य कृष्ण लीला को भारत ही नहीं पूरा विश्व मैं ख्याति प्राप्त है | माना जाता है श्री कृष्ण की इस जीवन लीला को देखने के लिए देवता भी स्वर्ग से काशी के तुलसी घाट पर अवतरित होते हैं|

भगवान श्री कृष्ण के कालिया मर्दन अथवा नाग नथैया लीला का आयोजन लगभग 450 वर्षों से भी पहले से गोस्वामी तुलसीदास तुलसी घाट पर कार्तिक मास शुरू की थी यह लीला ब्रज विलास की चौपाई पर आधारित है कृष्ण लीला के आधार पर की जाती है| इसका आयोजन संकट मोचन के महंत का परिवार करता है कई अन्य लोगों ने भी इस लीला का मंचन वह कार्यक्रम आयोजन करने का प्रयास किया, परंतु कुछ ना कुछ देवी व्यवधान के वजह से वह लोग उसमें सफल ना हो सके |ऐसा माना जाता है, कि नाग नथैया का मूल महाभारत में वर्णित है, बताते हैं कालिया नाग को नागराज भी कहा जाता था | सौभारी मुनि के साथ और गरुड़ के भय से रबड़ी दीप से भागकर व्रजभूमि में आकर यमुना में रहने लगे इसी के नाम से ब्रजभूमि के यमुना तट पर कालीदह नामक स्थान आज भी प्रसिद्ध है|

कालिया नाग के यमुना में आकर छिपने से यमुना का जल विषैला हो गया था|कालिया नाग यमुना के जल को इस कदर विषैला कर दिया, निकलने वाले वाष्प वातावरण में आने वाले सभी पक्षी जानवर मनुष्य भस्म हो जाते थे, अथवा पीने के बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे| कालिया नाग के विष के प्रभाव से से यमुना का रंग भी काला पड़ गया था| ऐसे में भगवान श्री कृष्णा तय किया कालिया नाग का नाश करना होगा| उन्होंने इस उद्देश्य यमुना किनारे साथियों के साथ कंदूक कीड़ा अथवा गेंद के साथ खेलने का नाटक किया और जानबूझकर खेलते खेलते गेम यमुना नदी में फेंक दी थी, और उस गेंद को लाने के बहाने नदी में छुप कर रहा है कालिया नाग नाश करने का प्रयास किया| इस पूरी लीला को नाग नथिया की लीला के नाम से जाना जाता है|वहीं दूसरी ओर श्री कृष्ण का लीला का आनंद लेने के लिए संकट मोचन के महंत प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र के कांग्रेस के मंत्री रह चुके अजय राय, काशी नरेश श्री मौजूद थे | महंत जी ने मीडिया से रूबरू होते हुए बताया कि यह 480 साल पुरानी सभ्यता है |

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